Tuesday, 25 June 2019

Realty of One Nation One Election

एक देश एक चुनाव की मांग फिर जोर पकड़ने लगी है। दोबारा सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर सर्वदलीय बैठक बुलाई और फिर एक समिति बना दी है, जो सुझाव देगी कि कैसे इस महत्वाकांक्षी योजना को अमलीजामा पहनाया जा सकता है। लेकिन एक मजबूत नेता और मजबूत सरकार के नाम पर हुए हालिया
लोकसभा चुनाव के नतीजों ने विपक्ष की बुनियाद को हिला दिया है। वे फिलहाल कतई नहीं चाहते कि राज्यों के विधानसभा चुनावों के जरिये सत्तापक्ष की लोकप्रियता को परखने का एक मौका भी गंवाया जाए। हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड के विधानसभा चुनावों को विपक्ष इस सुनहरे मौके के तौर पर देख रहा है। लेकिन विपक्ष के तर्कों या आशंकाओं को अलग रख दिया जाए तो भी एक देश एक चुनाव की व्यावहार्यता सवालों के घेरे में है।
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व्यापक राजनीतिक सुधारों की जरूरत


असल में एक साथ लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव को संकीर्णता की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। बगैर व्यापक राजनीतिक सुधार के यह बेमानी होगा। जो लोग यह तर्क दे रहे हैं कि 1967 के पहले तक देश में केंद्र और राज्यों के विधानसभा चुनाव साथ होते हैं। उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि आखिर इसके बाद ऐसा नहीं हो पाया। केंद्र की सत्ता में मजबूत कांग्रेस राज्यों में पकड़ खोती गई और नतीजा अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग के तौर पर देखने को मिला। सुप्रीम कोर्ट के कड़े फैसलों के बाद अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर तो अंकुश लेगा है, लेकिन दलबदल की राजनीति अभी भी सरकारों को अस्थिर कर रही है, तो क्या इस महत्वाकांक्षी अभियान के साथ सत्ता के लिए पाला बदलने की राजनीति पर भी रोक लगेगी, यह यक्ष प्रश्न है।

छोटे दलों की आशंकाएं दूर करना अहम

छोटे और क्षेत्रीय दलों की आशंकाओं को इस राजनीतिक सुधार के जरिये दूर किया जा सकता है, जो खंडित जनादेश आने पर बड़े दलों की सत्तालोलुपता की बलि चढ़ जाते हैं। उदाहरण के तौर पर हम कांग्रेस और भाजपा की सीधी लड़ाई वाले कई राज्यों में सपा, बसपा और अन्य दलों के दो चार विधायकों के सरकार में शामिल होने की घटनाएं देखते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में तो ऐसी घटनाएं आम हैं। तो क्या दलबदल पर पूरी तरह रोक का कानून आएगा ताकि जिस पार्टी के चिन्ह पर चुनाव जीता गया हो, उसको छोड़ते ही सदस्यता खुदबखुद खत्म हो जाए। पार्टी के किसी एक सदस्य ने पाला बदला हो या फिर पूरी पार्टी ही बड़े दल में समा गई हो, उन सभी की सदस्यता खत्म मानी जाए। टीडीपी के राज्यसभा के चार सदस्यों का भाजपा में शामिल हो जाना भी ऐसी ही चिंता पैदा करने वाला है। छोटे दलों के बहुमत पर चल रहीं कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थानों की सरकारों में रस्साकशी हम देख रहे हैं।

भारत अपनी राजनीतिक परंपरा विकसित करे 

आजादी के 72 साल बाद हमें यह महसूस हो रहा है कि ब्रिटिश संसदीय परंपरा से अलग भारत को अपनी राजनीतिक परंपराएं विकसित करने की जरूरत है। यह अमेरिकी राष्टपति प्रणाली और ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली के सम्मिश्रित गुणों को समाहित करके भी बनाई जा सकती है। अगर पांच साल में सभी विधानसभा और लोकसभा के चुनाव न संपन्न हो पाएं तो हम अमेरिकी व्यवस्था के मध्यावधि चुनाव की प्रणाली को आत्मसात कर सकते हैं। इसके तहत हर दो साल में कम से कम दस राज्यों के विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं। धीरे-धीरे ऐसा करके दूसरे राज्यों को भी इस मिशन से जोड़ा सकता है। एक साथ सभी राज्यों और सभी दलों की इस मुद्दे पर एकराय कायम कर पाना मुश्किल है।