Saturday, 20 April 2019

जनप्रतिनिधियों पर पहचान का संकट


चुनाव में कुछ सेलेब्रिटी, दलबदलू और पैराशूट नेता तो हर बार दिखते हैं , लेकिन इस बार सारे रिकॉर्ड टूटते नजर आ रहे हैं। सड़क पर सर्दी-गर्मी और बारिश की परवाह किए बिना चीख-चीख कर नारे लगाने और पसीना बहाने वाला कार्यकर्ता हैरान-परेशान हैं। विचारधारा हाशिए पर है, नेता पार्टी बदलने की पावती के साथ टिकट पा रहे हैं। चकाचौंध की दुनिया से निकले सेलेब्रिटी राजनीति का ककहरा पढ़कर जनप्रतिनिधि बनने की ख्वाहिश रखने वालों पर भारी पड़ गए हैं, तो क्या यह भारतीय राजनीति में जमीनी जनप्रतिनिधियों के लिए पहचान का संकट है या क्या राजनीतिक दलों को विचारधारा की पैठ का इतना भरोसा हो गया है कि वे किसी को भी किसी सीट पर खड़ा कर चुनाव जीतने का भरोसा रखती हैं। या इसे राजनीतिक दलों के प्रति जनता में बढ़ती उदासीनता का पैमाना माना जाए।

गली-मोहल्लों में पूछिए

अखबारों और चैनलों में जनता से जनप्रतिनिधियों के बारे में पूछे गए सवालों, गली-मोहल्लों की चर्चा और  घरों में अपनों के बीच बहस को सुनिए तो काफी हद तक जवाब आपको मिल जाएगा। यह सही है कि 95 फीसदी जनप्रतिनिधि इलााकाई जनता के लिए उपलब्ध नहीं हैं। जनता के लिए उनके शाही दरबार भी नहीं लगते। सांसद-विधायकों तक पहुंचने के लिए चाटुकारों, दलालों का चक्रव्यूह पार करना नामुमिकन सा हो गया है। पुलिस, प्रशासन, नगर निकाय या किसी अन्य स्थानीय समस्या को लेकर अगर कोई जन प्रतिनिधि के पास पहुंच भी जाता है तो सांसद तुरंत उसे स्थानीय स्तर की समस्या बताकर टरका देते हैं।

समर्पित कार्यकर्ताओं का गुस्सा


पार्टी के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं का गुस्सा तो और भी ज्यादा है, उसका कहना है कि पार्टी का सांसद-विधायक रहते हुए उनकी नहीं सुनी जा रही है। विकास कार्यों की तो बात तो छोड़ दीजिए। सांसदों का कहना है कि सालाना 5 करोड़ की निधि से किया गया विकास कार्य नहीं दिखता। लेकिन काडर की सबसे बड़ी पीड़ा सांसद-विधायकों से बढ़ती दूरी है। उनके-दुख में कोई नेता पहुंच जाए यही उनके लिए काफी है। शायद कारपोरेट राजनीति में जनप्रतिनिधि यह बात भूल गए हैं। धन-बल-छल के सहारे उन्हें नैय्या पार लगने का गुमान है और पार्टी और विचारधारा से तो बमुश्किल ही किसी का कोई सरोकार हो। लेकिन यह डाली पर बैठकर उसे काटने जैसा है। 

शतरंज के मोहरे

राजनीतिक दलों ने यह मान लिया है कि पार्टी काडर कमोवेश कहीं नहीं छिटकने वाला और शायद सांसदों-विधायकों का रवैया भी कभी नहीं बदलने वाला। ऐसे में प्रत्याशी को बदलना और वहां किसी सेलेब्रिटी को उतारने का तिकड़म बन गया है। मगर यह सच्चाई है कि दक्षिण की पुरानी धुरंधर फिल्मी हस्तियों को छोड़ दें तो उत्तर भारत में फिल्मी हस्तियां, खिलाड़ी या अन्य सेलेब्रिटी कभी एक या दो चुनाव जीतने से आगे नहीं बढ़ पाए। कुछ भाग्यशाली लोकप्रियता के बलबूते मंत्री बनने में कामयाब रहे। लेकिन कभी उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया और न ही उन्होंने इसकी कोशिश भी की। शतरंज के मोहरों की तरह राजनीति में उनका इस्तेमाल प्यादों की तरह बादशाह, रानी या बड़े हाथी को मात देने में किया गया है।

लंबी फेहरिस्त


हेमा मालिनी, उर्मिला मातोंडकर, राज बब्बर, निरुहुवा, जया प्रदा, शत्रुघ्न सिन्हा, रवि किशन, मनोज तिवारी, पूनम सिन्हा, गौतम गंभीर (संभावित)  जैसे सेलेब्रिटी तो सिर्फ यूपी और दिल्ली से मैदान में हैं। बंगाल ने फिर सारे रिकॉर्ड टूट रहे हैं। आसनसोल में बाबुल सुप्रिया के खिलाफ टीएमसी की मुनमुन सेन, घाटाल से अभिनेता देव, यादवपुर से मिमी चक्रवर्ती, बशीरहाट से नुसरत जहां, बीरभूम से शताब्दी राय, बालूरघाट से अर्पिता घोष किस्मत आजमा रही हैं। भाजपा ने भी हुगली से अभिनेत्री लॉकेट चटर्जी, उलबेरिया से जय बनर्जी मैदान में हैं। कुल मिलाकर सारे राज्यों को जोड़ लें तो यह संख्या 60 से 70 के बीच है।

आत्मघाती कदम


अगर फिल्मी हस्तियों पर दांव लगाने को राजनीतिक विचारधारा की मजबूती से जोड़कर देखा जाए  तो न्याय नहीं होगा। गांव और कस्बों से लेकर शहरी इलाकों में नफा-नुकसान को लेकर मतदाताओं का रुख तेजी से बदल रहा है। विचारधारा से उनका मोह नहीं दिखता। राज्यों के नतीजे इसकी तस्दीक करते हैं। ऐसे में राजनीतिक दल इसे सौ फीसदी फिट फार्मूला नहीं मान सकते कि काडर वोट और सेलेब्रिटी की लोकप्रियता किसी भी सीट पर जीत दिला सकती है। सेलेब्रिटी पर बढ़ती निर्भरता काडर की राजनीतिक दलों से दूरी और चुनावों को लेकर उदासीनता और बढ़ाएगी। लंबे समय में यह राजनीतिक दलों के लिए आत्मघाती कदम साबित होगा और धन-बल भी उन्हें डूबने से बचा नहीं पाएगा। इसका खतरा राष्ट्रीय दलों के लिए ज्यादा है, जो फिल्मी हस्तियों को ज्यादा आकर्षित करते हैं।

जमीनी नेता हाशिए पर


राजनीति में लगातार चुनाव लड़ रहे नेताओं की बात करें तो इनमें एक हिस्सा धाकड़ जमीनी नेताओं का है, जो राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के कोर ग्रुप में शामिल हैं। उन्हें किसी सीट से लड़ाया जाए जीतना तय है। वहीं कुछ जमीनी नेता भी हैं जो राजनीति में धन-बल या छल की बढ़ती प्रवृत्ति से अलग कार्यकर्ताओं और आम जनता के बीच सक्रिय हैं। उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और जनता के बीच उपलब्धता उन्हें हवाहवाई नेताओं से जुदा रखती है। ऐसे नेताओं में यह माद्दा दिखता है कि वे पार्टी, विचारधारा या मुद्दों से ऊपर राजनीति करते हैं। मगर इनकी घटती तादाद राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घंटी है। जनाकांक्षाओं को ताक पर रखकर प्रत्याशी थोपने वाले राजनीतिक दल सोच लें कि यह राजनीतिक उदासीनता लोकतंत्र के साथ उनके विखंडन को भी बढ़ावा देगी। 

Wednesday, 3 April 2019

जात-पात और धर्म के आंकड़ों का सहारा क्यों 




राजनीतिक हलचल का सहारा लेना हो तो हम सब अखबार, पोर्टल और चैनलों का सहारा लेते हैं। संचार के इन माध्यमों में राज्यों और उनकी संसदीय सीटों पर राजनीतिक दलों की गतिविधियों की मालूमात पड़ती है। मगर यह बदकिस्मती है कि हर जगह राजनीतिक विश्लेषण मुद्दों की बजाय जातिगत और धार्मिक आंकड़ों के सहारे ही टिका है।
किसी भी सीट पर उम्मीदवारों के बारे में आप जानना चाहेंगे तो यही मिलेगा कि वह फलानी जाति के हैं। अमुक सीट पर उनकी जाति के इतने मतदाता है। उस सीट पर कितने हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई समुदाय के वोटर हैं। यह हिन्दुओं में ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय या कितने पिछड़े वर्ग या दलित मतदाता है। इन जातिगत या धार्मिक आंकड़ों को परोसकर क्या हम मतदाताओं को जागरूक कर रहे हैं या फिर उन्हें वहीं दशकों पुराने जातिगत समीकरणों के आधार पर वोट करने की ओर धकेल रहे हैं।
किस सीट पर कितने हिंदू, मुस्लिम या दूसरे धर्म के लोग इससे क्या फर्क पड़ता है। किस जाति के कितने मतदाता किस सीट पर हैं, क्या यह देश के सामने मौजूद शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी जैसे मुद्दों के सामने मायने रखता है।

चुनाव आयोग संज्ञान ले

मुझे लगता है कि चुनाव आयोग को इस मुद्दे पर गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए। उसे इस प्रकार की रिपोर्टिंग पर रोक लगानी चाहिए। फिर चाहे वह संसदीय या विधानसभा चुनाव हो या पंचायत का चुनाव हो। अगर सरकार जातिगत आंकड़ों को जारी करने से परहेज करती है तो कोई अन्य सार्वजनिक तौर पर इन आंकड़ो को उभारकर किसी जगह पर चुनाव को कैसे प्रभावित कर सकता है। क्या चुनाव आयोग इस मुद्दे पर गंभीर रुख दिखाएगा।

आचारसंहिता का डर नहीं


अफसोसनाक है कि चुनाव आयोग के पास आचार संहिता पर नोटिस जारी करने का तो अधिकार है, लेकिन उसे ज्यादातर मामले में कार्रवाई करने का कोई अधिकार नहीं है। राजनीतिक दलों या नेताओं में आचार संहिता का कोई डर नहीं है, उन्हें लगता है कि ज्यादा से ज्यादा एक केस ही दर्ज होगा, जो कुछ सालों की सुनवाई में दम तोड़ देगा। चुनाव आयोग चाहे तो अदालत का दरवाजा भी खटखटा सकता है, क्योंकि स्वनियमन इस मामले में कारगर होगा, ऐसा नहीं दिखता। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आय़ोग ने मिलकर कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। इसमें जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों पर अंकुश का मामला भी शामिल है।