जात-पात और धर्म के आंकड़ों का सहारा क्यों
राजनीतिक हलचल का सहारा लेना हो तो हम सब अखबार, पोर्टल और चैनलों का सहारा लेते हैं। संचार के इन माध्यमों में राज्यों और उनकी संसदीय सीटों पर राजनीतिक दलों की गतिविधियों की मालूमात पड़ती है। मगर यह बदकिस्मती है कि हर जगह राजनीतिक विश्लेषण मुद्दों की बजाय जातिगत और धार्मिक आंकड़ों के सहारे ही टिका है।
किसी भी सीट पर उम्मीदवारों के बारे में आप जानना चाहेंगे तो यही मिलेगा कि वह फलानी जाति के हैं। अमुक सीट पर उनकी जाति के इतने मतदाता है। उस सीट पर कितने हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई समुदाय के वोटर हैं। यह हिन्दुओं में ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय या कितने पिछड़े वर्ग या दलित मतदाता है। इन जातिगत या धार्मिक आंकड़ों को परोसकर क्या हम मतदाताओं को जागरूक कर रहे हैं या फिर उन्हें वहीं दशकों पुराने जातिगत समीकरणों के आधार पर वोट करने की ओर धकेल रहे हैं।
किस सीट पर कितने हिंदू, मुस्लिम या दूसरे धर्म के लोग इससे क्या फर्क पड़ता है। किस जाति के कितने मतदाता किस सीट पर हैं, क्या यह देश के सामने मौजूद शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी जैसे मुद्दों के सामने मायने रखता है।
चुनाव आयोग संज्ञान ले
मुझे लगता है कि चुनाव आयोग को इस मुद्दे पर गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए। उसे इस प्रकार की रिपोर्टिंग पर रोक लगानी चाहिए। फिर चाहे वह संसदीय या विधानसभा चुनाव हो या पंचायत का चुनाव हो। अगर सरकार जातिगत आंकड़ों को जारी करने से परहेज करती है तो कोई अन्य सार्वजनिक तौर पर इन आंकड़ो को उभारकर किसी जगह पर चुनाव को कैसे प्रभावित कर सकता है। क्या चुनाव आयोग इस मुद्दे पर गंभीर रुख दिखाएगा।आचारसंहिता का डर नहीं
अफसोसनाक है कि चुनाव आयोग के पास आचार संहिता पर नोटिस जारी करने का तो अधिकार है, लेकिन उसे ज्यादातर मामले में कार्रवाई करने का कोई अधिकार नहीं है। राजनीतिक दलों या नेताओं में आचार संहिता का कोई डर नहीं है, उन्हें लगता है कि ज्यादा से ज्यादा एक केस ही दर्ज होगा, जो कुछ सालों की सुनवाई में दम तोड़ देगा। चुनाव आयोग चाहे तो अदालत का दरवाजा भी खटखटा सकता है, क्योंकि स्वनियमन इस मामले में कारगर होगा, ऐसा नहीं दिखता। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आय़ोग ने मिलकर कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। इसमें जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों पर अंकुश का मामला भी शामिल है।

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