Tuesday, 25 June 2019

Realty of One Nation One Election

एक देश एक चुनाव की मांग फिर जोर पकड़ने लगी है। दोबारा सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर सर्वदलीय बैठक बुलाई और फिर एक समिति बना दी है, जो सुझाव देगी कि कैसे इस महत्वाकांक्षी योजना को अमलीजामा पहनाया जा सकता है। लेकिन एक मजबूत नेता और मजबूत सरकार के नाम पर हुए हालिया
लोकसभा चुनाव के नतीजों ने विपक्ष की बुनियाद को हिला दिया है। वे फिलहाल कतई नहीं चाहते कि राज्यों के विधानसभा चुनावों के जरिये सत्तापक्ष की लोकप्रियता को परखने का एक मौका भी गंवाया जाए। हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड के विधानसभा चुनावों को विपक्ष इस सुनहरे मौके के तौर पर देख रहा है। लेकिन विपक्ष के तर्कों या आशंकाओं को अलग रख दिया जाए तो भी एक देश एक चुनाव की व्यावहार्यता सवालों के घेरे में है।
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व्यापक राजनीतिक सुधारों की जरूरत


असल में एक साथ लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव को संकीर्णता की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। बगैर व्यापक राजनीतिक सुधार के यह बेमानी होगा। जो लोग यह तर्क दे रहे हैं कि 1967 के पहले तक देश में केंद्र और राज्यों के विधानसभा चुनाव साथ होते हैं। उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि आखिर इसके बाद ऐसा नहीं हो पाया। केंद्र की सत्ता में मजबूत कांग्रेस राज्यों में पकड़ खोती गई और नतीजा अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग के तौर पर देखने को मिला। सुप्रीम कोर्ट के कड़े फैसलों के बाद अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर तो अंकुश लेगा है, लेकिन दलबदल की राजनीति अभी भी सरकारों को अस्थिर कर रही है, तो क्या इस महत्वाकांक्षी अभियान के साथ सत्ता के लिए पाला बदलने की राजनीति पर भी रोक लगेगी, यह यक्ष प्रश्न है।

छोटे दलों की आशंकाएं दूर करना अहम

छोटे और क्षेत्रीय दलों की आशंकाओं को इस राजनीतिक सुधार के जरिये दूर किया जा सकता है, जो खंडित जनादेश आने पर बड़े दलों की सत्तालोलुपता की बलि चढ़ जाते हैं। उदाहरण के तौर पर हम कांग्रेस और भाजपा की सीधी लड़ाई वाले कई राज्यों में सपा, बसपा और अन्य दलों के दो चार विधायकों के सरकार में शामिल होने की घटनाएं देखते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में तो ऐसी घटनाएं आम हैं। तो क्या दलबदल पर पूरी तरह रोक का कानून आएगा ताकि जिस पार्टी के चिन्ह पर चुनाव जीता गया हो, उसको छोड़ते ही सदस्यता खुदबखुद खत्म हो जाए। पार्टी के किसी एक सदस्य ने पाला बदला हो या फिर पूरी पार्टी ही बड़े दल में समा गई हो, उन सभी की सदस्यता खत्म मानी जाए। टीडीपी के राज्यसभा के चार सदस्यों का भाजपा में शामिल हो जाना भी ऐसी ही चिंता पैदा करने वाला है। छोटे दलों के बहुमत पर चल रहीं कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थानों की सरकारों में रस्साकशी हम देख रहे हैं।

भारत अपनी राजनीतिक परंपरा विकसित करे 

आजादी के 72 साल बाद हमें यह महसूस हो रहा है कि ब्रिटिश संसदीय परंपरा से अलग भारत को अपनी राजनीतिक परंपराएं विकसित करने की जरूरत है। यह अमेरिकी राष्टपति प्रणाली और ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली के सम्मिश्रित गुणों को समाहित करके भी बनाई जा सकती है। अगर पांच साल में सभी विधानसभा और लोकसभा के चुनाव न संपन्न हो पाएं तो हम अमेरिकी व्यवस्था के मध्यावधि चुनाव की प्रणाली को आत्मसात कर सकते हैं। इसके तहत हर दो साल में कम से कम दस राज्यों के विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं। धीरे-धीरे ऐसा करके दूसरे राज्यों को भी इस मिशन से जोड़ा सकता है। एक साथ सभी राज्यों और सभी दलों की इस मुद्दे पर एकराय कायम कर पाना मुश्किल है। 

Tuesday, 28 May 2019

CONGRESS और Rahul के सामने अब एक ही विकल्प

CONGRESS को अब इस रास्ते पर चलना होगा

आम चुनाव के नतीजे आ चुके हैं, जिनमें कांग्रेस बुरी तरह हारी है और भाजपा ने 2014 का रिकॉर्ड तोड़ फिर से सत्ता हासिल की है। राहुल गांधी ने आक्रामक शैली के साथ चुनाव में खुद को भाजपा और उसके करिश्माई नेता नरेंद्र मोदी के सामने खड़े रखने की खूब कोशिश की, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। मजबूत, नीयत और नीति के साथ मजबूत प्रचार तंत्र और सुनियोजित चुनाव प्रबंधन के बलबूते भाजपा कांग्रेस से कोसों आगे निकल गई है। स्वाभाविक है कि कांग्रेस में नेतृृत्व पर सवाल उठते, लेकिन कांग्रेस में कमान राहुल गांधी के हाथ में रहे या किसी अन्य के, यक्ष प्रश्न उठता है कि आखिर वह जनता के बीच अपनी जगह फिर कैसे बनाएगी।
कमर तोड़ने वाले नतीजों के बाद कांग्रेस को छह महीनों के भीतर झारखंड, महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली के विधानसभा चुनावों का सामना करना है। एक विकल्प है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव मैदान में उतरे या फिर दूरगामी परिणामों की सोचकर नई रणनीति अख्तियार करे। ताकि कांग्रेस को 2021 के यूपी चुनाव या 2024 के लोकसभा चुनाव में पासा पलटने की स्थिति में आ सके।


सोचना होगा पवार, ममता जैसे दिग्गज क्यों अलग हुए

इसकी शुरुआत गांधी परिवार को नेतृत्व की कुर्बानी देने के साथ वृहत्तर यानी ग्रेटर कांग्रेस के लिए भागीरथ अभियान छेड़ते हुए करनी चाहिए। आप सभी को विदित होगा कि आज कई ऐसे क्षेत्रीय क्षत्रप हैं, जो कभी कांग्रेस के कद्दावर नेता हुआ करते थे। मसलन पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, एनसीपी में शरद पवार, असम में हेमंत बिस्वा सरमा। लेकिन गांधी परिवार से अनबन या कांग्रेस की ढुलमुल नीतियों के चलते न केवल इन दलों ने अपनी पार्टी खड़ी की बल्कि कांग्रेस को पीछे धकेल कर अपने राज्य में एक मजबूत ताकत बनकर उभरे।
कांग्रेस में रहते हुए ममता को वह वाम दलों से लोहा लेने की खुली छूट कभी नहीं मिली और उन्होंने अपने दम पर लेफ्ट के किले को ढहाया। वह पिछले दो बार से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं।शरद पवार भी ऐसे नेता हैं, जिन्होंने सोनिया के नेतृत्व को  लेकर कांग्रेस छोड़ राकांपा बनाई। आज उम्र की वजह से पवार सक्रिय राजनीति से दूरी बना चुके हैं औऱ उनका दल भी नेतृत्वविहीनता का शिकार है। ऐसे में कांग्रेस और राकांपा का विलय पहला कदम हो सकता है, जो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में दोनों दलों को मजबूती दे। यह नहीं भूलना चाहिए कि वाईएसआर कांग्रेस भी कांग्रेस से टूटकर बनी थी। तीन चौथाई बहुमत लेकर आई वाईएसआर को फिलहाल पाने में ला पाना कांग्रेस के लिए शायद मुनासिब न हो। लेकिन सबसे पहले पहल तो दोनों दलों के शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत शुरू करने की हो। यह भी विकल्प हो सकता है कि विलय होने तक कांग्रेस उस राज्य में क्षेत्रीय पार्टी के झंडे तले ही चुनाव लड़े, जैसे बंगाल में टीएमसी के चुनाव चिन्ह के तले कांग्रेस आगे बढ़े।

अलग हुए दलों को साथ लाए


तमिल मनिला कांग्रेस जैसे कुछ और दल भी हैं, जो कांग्रेस से अलग होकर खुद तो कुछ नहीं कर पाए, लेकिन मूल पार्टी को काफी हद तक नुकसान पहुंचा गए। कांग्रेस में वरिष्ठ स्तर के कई ऐसे नेता भी हैं, जो या तो भाजपा या अन्य मजबूत क्षेत्रीय दलों के पाले में जा चुके हैं या फिर राजनीतिक सक्रियता छोड़ चुके हैं। पूर्वोत्तर में हेमंत बिस्वा सरमा, या अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू की पार्टी एनपीपी भी कभी कांग्रेस का हिस्सा थी। पीए संगमा जैसे पूर्वोत्तर के बड़े नेता ने भी कांग्रेस ने छोड़ दी और आज पूरे नार्थ ईस्ट में कांग्रेस का क्या हाल है, किसी से छिपा नहीं है। शरद यादव जैसे बाहरी नेता जो अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, उन्हें भी समायोजित किया जा सकता है।

गांधी का नाम काम नहीं आएगा

असल में कांग्रेस नेतृत्व को एक बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि देश में 70 फीसदी आबादी अब ऐसे लोगों की है, जिन्होंने पंडित नेहरू या इंदिरा गांधी का शासन नहीं देखा, जब गांधी परिवार की तूती बोलती थी। या वे उस समय तक राजनीतिक रूप से परिपक्वव नहीं हुए थे, जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर में राजीव जीते और उन्होंने पांच साल सरकार चलाई। राजीव की हत्या के बाद ऐसा अवसर आया जब कांग्रेस चाहती तो गांधी परिवार के बाहर नए नेता को खड़ी करती। लेकिन निजी महात्वाकांक्षाएं, क्षेत्रीय नेताओं की प्रतिभा पर भारी पड़ी और पवार, ममता जैसे तेजतर्रार नेताओं ने पार्टी से किनारा कर लिया। सोनिया गांधी 20 साल कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं और फिर पार्टी की कमान बेटे को सौंप दी। इस बीच कांग्रेस सत्ता में आई तो सोनिया या राहुल के पास मौका था कि वे सरकार में रहकर खुद को साबित करें, लेकिन उन्होंने यह मौका गंवा दिया। शायद उन्हें गुमान था कि गांधी परिवार में तो सिर्फ प्रधानमंत्री जन्म लेते हैं।

जमीनी राजनीति को समझे आलाकमान

यही वजह रही कि संगठन की जमीनी राजनीति में तपकर कुंदन बनकर निकले मोदी, अमित शाह जैसे नेताओं की अगुआई में भाजपा चुनाव दर चुनाव आगे निकलती गई। अटल के सक्रिय राजनीति से दूर होने के बीच 2009 के चुनाव में पार्टी को सत्ता में वापसी कराने में नाकामी आडवाणी को भारी पड़ी। हिंदुत्व और विकास के नए मॉडल नरेंद्र मोदी को गुजरात से बाहर पूरे देश में पार्टी को सत्ता में वापसी कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई और उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अब गांधी परिवार निजी महत्वाकांक्षाओं को पूरे रखकर पार्टी के पुनरोद्धार के बारे में सोचेगा। 

युवा नेताओं की अनदेखी

युवा नेताओं की अनदेखी भी पार्टी को भारी पड़ी। मोदी की केंद्रीय राजनीति में बढ़ते दबदबे के बीच पंजाब, मध्य प्रदेश और राजस्थान में जीत के बाद कांग्रेस को अवसर मिला था कि वह किसी युवा नेता को सत्ता सौंपती। लेकिन कमान गांधी परिवार के दशकों तक किचन कैबिनेट में  शामिल रहे नेताओं को मिली। ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं को कमान सौंपने की बजाय गांधी परिवार के भरोसेमंद कमलनाथ और अशोक गहलोत बाजी मार ले गए। इसे कतई दूरदर्शी फैसला नहीं माना जा सकता था। गुजरात में ही जिग्नेश मेवाणी,  अल्पेश ठाकोर और  हार्दिक पटेल जैसे नेताओं को कांग्रेस से जोड़ने और बड़ी जिम्मेदारी देने को लेकर जो हिचकिचाहट दिखा, उसका खामियाजा पार्टी ने चुनाव में भुगता। कांग्रेस को यह समझना होगा कि विचारधारा, जातिगत समीकरणों के अलावा व्यक्तिगत महात्वाकांक्षा भी राजनीति में काफी अहमियत रखती है औऱ उसे पार्टी के दूसरे औऱ तीसरे दर्ज के नेताओं को उपर लाकर ही वह कोई नरेंद्र मोदी तैयार कर सकती है।










Saturday, 20 April 2019

जनप्रतिनिधियों पर पहचान का संकट


चुनाव में कुछ सेलेब्रिटी, दलबदलू और पैराशूट नेता तो हर बार दिखते हैं , लेकिन इस बार सारे रिकॉर्ड टूटते नजर आ रहे हैं। सड़क पर सर्दी-गर्मी और बारिश की परवाह किए बिना चीख-चीख कर नारे लगाने और पसीना बहाने वाला कार्यकर्ता हैरान-परेशान हैं। विचारधारा हाशिए पर है, नेता पार्टी बदलने की पावती के साथ टिकट पा रहे हैं। चकाचौंध की दुनिया से निकले सेलेब्रिटी राजनीति का ककहरा पढ़कर जनप्रतिनिधि बनने की ख्वाहिश रखने वालों पर भारी पड़ गए हैं, तो क्या यह भारतीय राजनीति में जमीनी जनप्रतिनिधियों के लिए पहचान का संकट है या क्या राजनीतिक दलों को विचारधारा की पैठ का इतना भरोसा हो गया है कि वे किसी को भी किसी सीट पर खड़ा कर चुनाव जीतने का भरोसा रखती हैं। या इसे राजनीतिक दलों के प्रति जनता में बढ़ती उदासीनता का पैमाना माना जाए।

गली-मोहल्लों में पूछिए

अखबारों और चैनलों में जनता से जनप्रतिनिधियों के बारे में पूछे गए सवालों, गली-मोहल्लों की चर्चा और  घरों में अपनों के बीच बहस को सुनिए तो काफी हद तक जवाब आपको मिल जाएगा। यह सही है कि 95 फीसदी जनप्रतिनिधि इलााकाई जनता के लिए उपलब्ध नहीं हैं। जनता के लिए उनके शाही दरबार भी नहीं लगते। सांसद-विधायकों तक पहुंचने के लिए चाटुकारों, दलालों का चक्रव्यूह पार करना नामुमिकन सा हो गया है। पुलिस, प्रशासन, नगर निकाय या किसी अन्य स्थानीय समस्या को लेकर अगर कोई जन प्रतिनिधि के पास पहुंच भी जाता है तो सांसद तुरंत उसे स्थानीय स्तर की समस्या बताकर टरका देते हैं।

समर्पित कार्यकर्ताओं का गुस्सा


पार्टी के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं का गुस्सा तो और भी ज्यादा है, उसका कहना है कि पार्टी का सांसद-विधायक रहते हुए उनकी नहीं सुनी जा रही है। विकास कार्यों की तो बात तो छोड़ दीजिए। सांसदों का कहना है कि सालाना 5 करोड़ की निधि से किया गया विकास कार्य नहीं दिखता। लेकिन काडर की सबसे बड़ी पीड़ा सांसद-विधायकों से बढ़ती दूरी है। उनके-दुख में कोई नेता पहुंच जाए यही उनके लिए काफी है। शायद कारपोरेट राजनीति में जनप्रतिनिधि यह बात भूल गए हैं। धन-बल-छल के सहारे उन्हें नैय्या पार लगने का गुमान है और पार्टी और विचारधारा से तो बमुश्किल ही किसी का कोई सरोकार हो। लेकिन यह डाली पर बैठकर उसे काटने जैसा है। 

शतरंज के मोहरे

राजनीतिक दलों ने यह मान लिया है कि पार्टी काडर कमोवेश कहीं नहीं छिटकने वाला और शायद सांसदों-विधायकों का रवैया भी कभी नहीं बदलने वाला। ऐसे में प्रत्याशी को बदलना और वहां किसी सेलेब्रिटी को उतारने का तिकड़म बन गया है। मगर यह सच्चाई है कि दक्षिण की पुरानी धुरंधर फिल्मी हस्तियों को छोड़ दें तो उत्तर भारत में फिल्मी हस्तियां, खिलाड़ी या अन्य सेलेब्रिटी कभी एक या दो चुनाव जीतने से आगे नहीं बढ़ पाए। कुछ भाग्यशाली लोकप्रियता के बलबूते मंत्री बनने में कामयाब रहे। लेकिन कभी उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया और न ही उन्होंने इसकी कोशिश भी की। शतरंज के मोहरों की तरह राजनीति में उनका इस्तेमाल प्यादों की तरह बादशाह, रानी या बड़े हाथी को मात देने में किया गया है।

लंबी फेहरिस्त


हेमा मालिनी, उर्मिला मातोंडकर, राज बब्बर, निरुहुवा, जया प्रदा, शत्रुघ्न सिन्हा, रवि किशन, मनोज तिवारी, पूनम सिन्हा, गौतम गंभीर (संभावित)  जैसे सेलेब्रिटी तो सिर्फ यूपी और दिल्ली से मैदान में हैं। बंगाल ने फिर सारे रिकॉर्ड टूट रहे हैं। आसनसोल में बाबुल सुप्रिया के खिलाफ टीएमसी की मुनमुन सेन, घाटाल से अभिनेता देव, यादवपुर से मिमी चक्रवर्ती, बशीरहाट से नुसरत जहां, बीरभूम से शताब्दी राय, बालूरघाट से अर्पिता घोष किस्मत आजमा रही हैं। भाजपा ने भी हुगली से अभिनेत्री लॉकेट चटर्जी, उलबेरिया से जय बनर्जी मैदान में हैं। कुल मिलाकर सारे राज्यों को जोड़ लें तो यह संख्या 60 से 70 के बीच है।

आत्मघाती कदम


अगर फिल्मी हस्तियों पर दांव लगाने को राजनीतिक विचारधारा की मजबूती से जोड़कर देखा जाए  तो न्याय नहीं होगा। गांव और कस्बों से लेकर शहरी इलाकों में नफा-नुकसान को लेकर मतदाताओं का रुख तेजी से बदल रहा है। विचारधारा से उनका मोह नहीं दिखता। राज्यों के नतीजे इसकी तस्दीक करते हैं। ऐसे में राजनीतिक दल इसे सौ फीसदी फिट फार्मूला नहीं मान सकते कि काडर वोट और सेलेब्रिटी की लोकप्रियता किसी भी सीट पर जीत दिला सकती है। सेलेब्रिटी पर बढ़ती निर्भरता काडर की राजनीतिक दलों से दूरी और चुनावों को लेकर उदासीनता और बढ़ाएगी। लंबे समय में यह राजनीतिक दलों के लिए आत्मघाती कदम साबित होगा और धन-बल भी उन्हें डूबने से बचा नहीं पाएगा। इसका खतरा राष्ट्रीय दलों के लिए ज्यादा है, जो फिल्मी हस्तियों को ज्यादा आकर्षित करते हैं।

जमीनी नेता हाशिए पर


राजनीति में लगातार चुनाव लड़ रहे नेताओं की बात करें तो इनमें एक हिस्सा धाकड़ जमीनी नेताओं का है, जो राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के कोर ग्रुप में शामिल हैं। उन्हें किसी सीट से लड़ाया जाए जीतना तय है। वहीं कुछ जमीनी नेता भी हैं जो राजनीति में धन-बल या छल की बढ़ती प्रवृत्ति से अलग कार्यकर्ताओं और आम जनता के बीच सक्रिय हैं। उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और जनता के बीच उपलब्धता उन्हें हवाहवाई नेताओं से जुदा रखती है। ऐसे नेताओं में यह माद्दा दिखता है कि वे पार्टी, विचारधारा या मुद्दों से ऊपर राजनीति करते हैं। मगर इनकी घटती तादाद राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घंटी है। जनाकांक्षाओं को ताक पर रखकर प्रत्याशी थोपने वाले राजनीतिक दल सोच लें कि यह राजनीतिक उदासीनता लोकतंत्र के साथ उनके विखंडन को भी बढ़ावा देगी। 

Wednesday, 3 April 2019

जात-पात और धर्म के आंकड़ों का सहारा क्यों 




राजनीतिक हलचल का सहारा लेना हो तो हम सब अखबार, पोर्टल और चैनलों का सहारा लेते हैं। संचार के इन माध्यमों में राज्यों और उनकी संसदीय सीटों पर राजनीतिक दलों की गतिविधियों की मालूमात पड़ती है। मगर यह बदकिस्मती है कि हर जगह राजनीतिक विश्लेषण मुद्दों की बजाय जातिगत और धार्मिक आंकड़ों के सहारे ही टिका है।
किसी भी सीट पर उम्मीदवारों के बारे में आप जानना चाहेंगे तो यही मिलेगा कि वह फलानी जाति के हैं। अमुक सीट पर उनकी जाति के इतने मतदाता है। उस सीट पर कितने हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई समुदाय के वोटर हैं। यह हिन्दुओं में ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय या कितने पिछड़े वर्ग या दलित मतदाता है। इन जातिगत या धार्मिक आंकड़ों को परोसकर क्या हम मतदाताओं को जागरूक कर रहे हैं या फिर उन्हें वहीं दशकों पुराने जातिगत समीकरणों के आधार पर वोट करने की ओर धकेल रहे हैं।
किस सीट पर कितने हिंदू, मुस्लिम या दूसरे धर्म के लोग इससे क्या फर्क पड़ता है। किस जाति के कितने मतदाता किस सीट पर हैं, क्या यह देश के सामने मौजूद शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी जैसे मुद्दों के सामने मायने रखता है।

चुनाव आयोग संज्ञान ले

मुझे लगता है कि चुनाव आयोग को इस मुद्दे पर गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए। उसे इस प्रकार की रिपोर्टिंग पर रोक लगानी चाहिए। फिर चाहे वह संसदीय या विधानसभा चुनाव हो या पंचायत का चुनाव हो। अगर सरकार जातिगत आंकड़ों को जारी करने से परहेज करती है तो कोई अन्य सार्वजनिक तौर पर इन आंकड़ो को उभारकर किसी जगह पर चुनाव को कैसे प्रभावित कर सकता है। क्या चुनाव आयोग इस मुद्दे पर गंभीर रुख दिखाएगा।

आचारसंहिता का डर नहीं


अफसोसनाक है कि चुनाव आयोग के पास आचार संहिता पर नोटिस जारी करने का तो अधिकार है, लेकिन उसे ज्यादातर मामले में कार्रवाई करने का कोई अधिकार नहीं है। राजनीतिक दलों या नेताओं में आचार संहिता का कोई डर नहीं है, उन्हें लगता है कि ज्यादा से ज्यादा एक केस ही दर्ज होगा, जो कुछ सालों की सुनवाई में दम तोड़ देगा। चुनाव आयोग चाहे तो अदालत का दरवाजा भी खटखटा सकता है, क्योंकि स्वनियमन इस मामले में कारगर होगा, ऐसा नहीं दिखता। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आय़ोग ने मिलकर कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। इसमें जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों पर अंकुश का मामला भी शामिल है।