एक देश एक चुनाव की मांग फिर जोर पकड़ने लगी है। दोबारा सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर सर्वदलीय बैठक बुलाई और फिर एक समिति बना दी है, जो सुझाव देगी कि कैसे इस महत्वाकांक्षी योजना को अमलीजामा पहनाया जा सकता है। लेकिन एक मजबूत नेता और मजबूत सरकार के नाम पर हुए हालिया
लोकसभा चुनाव के नतीजों ने विपक्ष की बुनियाद को हिला दिया है। वे फिलहाल कतई नहीं चाहते कि राज्यों के विधानसभा चुनावों के जरिये सत्तापक्ष की लोकप्रियता को परखने का एक मौका भी गंवाया जाए। हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड के विधानसभा चुनावों को विपक्ष इस सुनहरे मौके के तौर पर देख रहा है। लेकिन विपक्ष के तर्कों या आशंकाओं को अलग रख दिया जाए तो भी एक देश एक चुनाव की व्यावहार्यता सवालों के घेरे में है।
http://www.yahoonewsindia.com/
असल में एक साथ लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव को संकीर्णता की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। बगैर व्यापक राजनीतिक सुधार के यह बेमानी होगा। जो लोग यह तर्क दे रहे हैं कि 1967 के पहले तक देश में केंद्र और राज्यों के विधानसभा चुनाव साथ होते हैं। उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि आखिर इसके बाद ऐसा नहीं हो पाया। केंद्र की सत्ता में मजबूत कांग्रेस राज्यों में पकड़ खोती गई और नतीजा अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग के तौर पर देखने को मिला। सुप्रीम कोर्ट के कड़े फैसलों के बाद अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर तो अंकुश लेगा है, लेकिन दलबदल की राजनीति अभी भी सरकारों को अस्थिर कर रही है, तो क्या इस महत्वाकांक्षी अभियान के साथ सत्ता के लिए पाला बदलने की राजनीति पर भी रोक लगेगी, यह यक्ष प्रश्न है।
लोकसभा चुनाव के नतीजों ने विपक्ष की बुनियाद को हिला दिया है। वे फिलहाल कतई नहीं चाहते कि राज्यों के विधानसभा चुनावों के जरिये सत्तापक्ष की लोकप्रियता को परखने का एक मौका भी गंवाया जाए। हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड के विधानसभा चुनावों को विपक्ष इस सुनहरे मौके के तौर पर देख रहा है। लेकिन विपक्ष के तर्कों या आशंकाओं को अलग रख दिया जाए तो भी एक देश एक चुनाव की व्यावहार्यता सवालों के घेरे में है।
http://www.yahoonewsindia.com/
व्यापक राजनीतिक सुधारों की जरूरत
असल में एक साथ लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव को संकीर्णता की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। बगैर व्यापक राजनीतिक सुधार के यह बेमानी होगा। जो लोग यह तर्क दे रहे हैं कि 1967 के पहले तक देश में केंद्र और राज्यों के विधानसभा चुनाव साथ होते हैं। उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि आखिर इसके बाद ऐसा नहीं हो पाया। केंद्र की सत्ता में मजबूत कांग्रेस राज्यों में पकड़ खोती गई और नतीजा अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग के तौर पर देखने को मिला। सुप्रीम कोर्ट के कड़े फैसलों के बाद अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर तो अंकुश लेगा है, लेकिन दलबदल की राजनीति अभी भी सरकारों को अस्थिर कर रही है, तो क्या इस महत्वाकांक्षी अभियान के साथ सत्ता के लिए पाला बदलने की राजनीति पर भी रोक लगेगी, यह यक्ष प्रश्न है।

