Tuesday, 28 May 2019

CONGRESS और Rahul के सामने अब एक ही विकल्प

CONGRESS को अब इस रास्ते पर चलना होगा

आम चुनाव के नतीजे आ चुके हैं, जिनमें कांग्रेस बुरी तरह हारी है और भाजपा ने 2014 का रिकॉर्ड तोड़ फिर से सत्ता हासिल की है। राहुल गांधी ने आक्रामक शैली के साथ चुनाव में खुद को भाजपा और उसके करिश्माई नेता नरेंद्र मोदी के सामने खड़े रखने की खूब कोशिश की, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। मजबूत, नीयत और नीति के साथ मजबूत प्रचार तंत्र और सुनियोजित चुनाव प्रबंधन के बलबूते भाजपा कांग्रेस से कोसों आगे निकल गई है। स्वाभाविक है कि कांग्रेस में नेतृृत्व पर सवाल उठते, लेकिन कांग्रेस में कमान राहुल गांधी के हाथ में रहे या किसी अन्य के, यक्ष प्रश्न उठता है कि आखिर वह जनता के बीच अपनी जगह फिर कैसे बनाएगी।
कमर तोड़ने वाले नतीजों के बाद कांग्रेस को छह महीनों के भीतर झारखंड, महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली के विधानसभा चुनावों का सामना करना है। एक विकल्प है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव मैदान में उतरे या फिर दूरगामी परिणामों की सोचकर नई रणनीति अख्तियार करे। ताकि कांग्रेस को 2021 के यूपी चुनाव या 2024 के लोकसभा चुनाव में पासा पलटने की स्थिति में आ सके।


सोचना होगा पवार, ममता जैसे दिग्गज क्यों अलग हुए

इसकी शुरुआत गांधी परिवार को नेतृत्व की कुर्बानी देने के साथ वृहत्तर यानी ग्रेटर कांग्रेस के लिए भागीरथ अभियान छेड़ते हुए करनी चाहिए। आप सभी को विदित होगा कि आज कई ऐसे क्षेत्रीय क्षत्रप हैं, जो कभी कांग्रेस के कद्दावर नेता हुआ करते थे। मसलन पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, एनसीपी में शरद पवार, असम में हेमंत बिस्वा सरमा। लेकिन गांधी परिवार से अनबन या कांग्रेस की ढुलमुल नीतियों के चलते न केवल इन दलों ने अपनी पार्टी खड़ी की बल्कि कांग्रेस को पीछे धकेल कर अपने राज्य में एक मजबूत ताकत बनकर उभरे।
कांग्रेस में रहते हुए ममता को वह वाम दलों से लोहा लेने की खुली छूट कभी नहीं मिली और उन्होंने अपने दम पर लेफ्ट के किले को ढहाया। वह पिछले दो बार से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं।शरद पवार भी ऐसे नेता हैं, जिन्होंने सोनिया के नेतृत्व को  लेकर कांग्रेस छोड़ राकांपा बनाई। आज उम्र की वजह से पवार सक्रिय राजनीति से दूरी बना चुके हैं औऱ उनका दल भी नेतृत्वविहीनता का शिकार है। ऐसे में कांग्रेस और राकांपा का विलय पहला कदम हो सकता है, जो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में दोनों दलों को मजबूती दे। यह नहीं भूलना चाहिए कि वाईएसआर कांग्रेस भी कांग्रेस से टूटकर बनी थी। तीन चौथाई बहुमत लेकर आई वाईएसआर को फिलहाल पाने में ला पाना कांग्रेस के लिए शायद मुनासिब न हो। लेकिन सबसे पहले पहल तो दोनों दलों के शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत शुरू करने की हो। यह भी विकल्प हो सकता है कि विलय होने तक कांग्रेस उस राज्य में क्षेत्रीय पार्टी के झंडे तले ही चुनाव लड़े, जैसे बंगाल में टीएमसी के चुनाव चिन्ह के तले कांग्रेस आगे बढ़े।

अलग हुए दलों को साथ लाए


तमिल मनिला कांग्रेस जैसे कुछ और दल भी हैं, जो कांग्रेस से अलग होकर खुद तो कुछ नहीं कर पाए, लेकिन मूल पार्टी को काफी हद तक नुकसान पहुंचा गए। कांग्रेस में वरिष्ठ स्तर के कई ऐसे नेता भी हैं, जो या तो भाजपा या अन्य मजबूत क्षेत्रीय दलों के पाले में जा चुके हैं या फिर राजनीतिक सक्रियता छोड़ चुके हैं। पूर्वोत्तर में हेमंत बिस्वा सरमा, या अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू की पार्टी एनपीपी भी कभी कांग्रेस का हिस्सा थी। पीए संगमा जैसे पूर्वोत्तर के बड़े नेता ने भी कांग्रेस ने छोड़ दी और आज पूरे नार्थ ईस्ट में कांग्रेस का क्या हाल है, किसी से छिपा नहीं है। शरद यादव जैसे बाहरी नेता जो अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, उन्हें भी समायोजित किया जा सकता है।

गांधी का नाम काम नहीं आएगा

असल में कांग्रेस नेतृत्व को एक बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि देश में 70 फीसदी आबादी अब ऐसे लोगों की है, जिन्होंने पंडित नेहरू या इंदिरा गांधी का शासन नहीं देखा, जब गांधी परिवार की तूती बोलती थी। या वे उस समय तक राजनीतिक रूप से परिपक्वव नहीं हुए थे, जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर में राजीव जीते और उन्होंने पांच साल सरकार चलाई। राजीव की हत्या के बाद ऐसा अवसर आया जब कांग्रेस चाहती तो गांधी परिवार के बाहर नए नेता को खड़ी करती। लेकिन निजी महात्वाकांक्षाएं, क्षेत्रीय नेताओं की प्रतिभा पर भारी पड़ी और पवार, ममता जैसे तेजतर्रार नेताओं ने पार्टी से किनारा कर लिया। सोनिया गांधी 20 साल कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं और फिर पार्टी की कमान बेटे को सौंप दी। इस बीच कांग्रेस सत्ता में आई तो सोनिया या राहुल के पास मौका था कि वे सरकार में रहकर खुद को साबित करें, लेकिन उन्होंने यह मौका गंवा दिया। शायद उन्हें गुमान था कि गांधी परिवार में तो सिर्फ प्रधानमंत्री जन्म लेते हैं।

जमीनी राजनीति को समझे आलाकमान

यही वजह रही कि संगठन की जमीनी राजनीति में तपकर कुंदन बनकर निकले मोदी, अमित शाह जैसे नेताओं की अगुआई में भाजपा चुनाव दर चुनाव आगे निकलती गई। अटल के सक्रिय राजनीति से दूर होने के बीच 2009 के चुनाव में पार्टी को सत्ता में वापसी कराने में नाकामी आडवाणी को भारी पड़ी। हिंदुत्व और विकास के नए मॉडल नरेंद्र मोदी को गुजरात से बाहर पूरे देश में पार्टी को सत्ता में वापसी कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई और उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अब गांधी परिवार निजी महत्वाकांक्षाओं को पूरे रखकर पार्टी के पुनरोद्धार के बारे में सोचेगा। 

युवा नेताओं की अनदेखी

युवा नेताओं की अनदेखी भी पार्टी को भारी पड़ी। मोदी की केंद्रीय राजनीति में बढ़ते दबदबे के बीच पंजाब, मध्य प्रदेश और राजस्थान में जीत के बाद कांग्रेस को अवसर मिला था कि वह किसी युवा नेता को सत्ता सौंपती। लेकिन कमान गांधी परिवार के दशकों तक किचन कैबिनेट में  शामिल रहे नेताओं को मिली। ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं को कमान सौंपने की बजाय गांधी परिवार के भरोसेमंद कमलनाथ और अशोक गहलोत बाजी मार ले गए। इसे कतई दूरदर्शी फैसला नहीं माना जा सकता था। गुजरात में ही जिग्नेश मेवाणी,  अल्पेश ठाकोर और  हार्दिक पटेल जैसे नेताओं को कांग्रेस से जोड़ने और बड़ी जिम्मेदारी देने को लेकर जो हिचकिचाहट दिखा, उसका खामियाजा पार्टी ने चुनाव में भुगता। कांग्रेस को यह समझना होगा कि विचारधारा, जातिगत समीकरणों के अलावा व्यक्तिगत महात्वाकांक्षा भी राजनीति में काफी अहमियत रखती है औऱ उसे पार्टी के दूसरे औऱ तीसरे दर्ज के नेताओं को उपर लाकर ही वह कोई नरेंद्र मोदी तैयार कर सकती है।










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