Thursday, 13 December 2018

किसानों का ब्रह्मास्त्र बना कर्ज माफी

पांच राज्यों के चुनावी नतीजे बताते हैं कि कर्जमाफी का वादा किसानों के लिए ब्रह्मास्त्र बन चुका है, क्योंकि उन्हें पता है कि सत्ता में आने के बाद किसी भी राजनीतिक दल से मोलभाव करना आसान नहीं है। इस सियासी दांव से किसानों की हालत भले ही न सुधरी हो, लेकिन यह उन्हें फौरी राहत जरूर दे रहा है। कांग्रेस के लिए राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में इस वादे ने काफी असर दिखाया है। बेहद कम सीटों से मध्य प्रदेश को गंवाने वाली भाजपा को यह मलाल जरूर हो रहा होगा कि उसने सत्ता में रहते कर्जमाफी लागू कर इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश नहीं की। 

इन तीन राज्यों के पहले उत्तर प्रदेश में भाजपा ने किसानों को कर्ज माफी का वादा अच्छे तरीके से भुनाया था और सत्ता में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई थी। पंजाब में यही फायदा कांग्रेस को सत्ता में वापसी करने में मिला और कर्नाटक में लाज बचा ली तो इसके पीछे भी किसानों का कर्ज माफ करना रहा। राजनीतिक पंडितों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अप्रैल 2017 से जुलाई 2018 तक तमिलनाडु, पंजाब, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में किसानों का एक लाख 80 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज माफ किया गया है, जो जीडीपी में करीब 1.5 फीसदी का असर डालता है, लेकिन किसानों के मुद्दे अपनी जगह कायम है।

राजनीतिक पार्टियां भी यह बखूबी जानती हैं। आज देश में कृषि का जीडीपी में योगदान महज 17 फीसदी रह गया है, जबकि इसमें कुल कामगार आबादी का 50 फीसदी लगा हुआ है। मतलब साफ है कि कृषि कार्यों में जरूरत का तीन से चार गुना लोग काम कर रहे हैं। ये बातें हम बचपन से एनसीईआरटी की किताबों में पढ़ते आ रहे हैं। आज सेवा क्षेत्र का जीडीपी में योगदान 53 फीसदी और औद्योगिक क्षेत्र का योगदान 31 फीसदी पहुंच चुका है और इन्हीं क्षेत्रों में रोजगार की सबसे ज्यादा संभावनाएं भी हैं।

राजनीतिक बयानबाजी से अलग सरकारें जानती हैं कि कृषि सुधार देश की बड़ी जरूरत है। कर्ज माफी से किसी राज्य में पांच से दस लाख किसानों को फौरी राहत मिल सकती है, लेकिन उनकी स्थिति नहीं सुधरेगी। वैसे भी कर्जमाफी से उन खेतिहर मजदूरों, बटाईदारों को लाभ नहीं मिलता, जिनकी संख्या देश में सात से नौ करोड़ के बीच है। बड़े किसानों और उनके समर्थक नेता यह भी नहीं चाहते कि मनरेगा के तहत मजदूरी बढ़ाई जाए, क्योंकि इससे उनकी लागत बढ़ने का अंदेशा राहत है।

एमएसपी संपन्नता की गारंटी नहीं

यह भी समझना होगा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों की संपन्नता की गारंटी नहीं बन सकता। यह सच्चाई है कि कोई भी सरकार गेहूं, चावल या किसी अन्य फसल की सौ फीसदी की खरीद नहीं कर सकती। गेहूं या चावल उत्पादन का 30 से 40 फीसदी खरीद ही सरकारें कर पाती हैं। बाकी बाजार में जाता है। मान लीजिए कि सरकार गेहूं का एमएसपी 30 रुपये कर दे तो बाजार में हाहाकार मच जाएगा। आज की लागत के हिसाब से आटे का दाम 50 रुपये प्रति किलो हो जाएगा और देश की बड़ी आबादी के सामने भूख का संकट खड़ा हो जाएगा। निस्संदेह कोई भी सरकार यह जोखिम मोल नहीं लेना चाहेगी।

मौसमी फसलों का संकट ज्यादा

किसानों की एक बड़ी समस्या मौसमी फलों या सब्जियों की है। आज महाराष्ट्र के नाशिक में बंपर पैदावार के बाद प्याज एक रुपये प्रति किलो भी नहीं बिक पा रहा है और किसान इसे सड़कों पर फेंक रहे हैं। यही हाल मध्य प्रदेश में लहसुन का है और यह भी कौड़ियों के दाम बिक रहा है। मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने भावांतर योजना के जरिये किसानों को मौसमी सब्जियों का उचित लाभ देने का काम जरूर किया, लेकिन यह मॉडल पूरी तरह कारगर नहीं है। तेलंगाना में केसीआर ने किसानों को प्रति एकड़ खेती की लागत के हिसाब से सीधे सब्सिडी देने का काम किया है औऱ इसमें कुछ अच्छी कामयाबी का राजनीतिक फायदा उसे चुनाव मे मिला है। केसीआर ने चुनाव के पहले करीब 60 हजार करोड़ रुपये की सौगात किसानों को दी और पिछली बार से ज्यादा वोटों से सत्ता में आने में कामयाब रहे।

राजनीति सबसे बड़ा रोड़ा

किसानों  से जुड़े सुधार का सबसे बड़ा रोड़ा रहा है कि अक्सर किसान संगठन और उनके आंदोलन राजनेताओं द्वारा हैक कर लिए जाते हैं। दिल्ली में हाल ही में ऐसा ही देखने को मिला था, जब किसान संघर्ष समिति के बैनर तले जमा हुए हजारों किसान अपनी मांगों को लेकर इकट्ठा हुए। हालांकि विपक्षी दलों के नेताओं ने वहां पहुंचकर सरकार पर हमला बोलना शुरू कर दिया और इसे राजनीतिक रैली मानकर नजरअंदाज किया जाने लगा। यूपी में महेंद्र सिंह टिकैत से लेकर महाराष्ट्र के विदर्भ में किसान नेता राजू शेट्टी का मामला हो, उनकी मांगों को अक्सर विपक्षी दल हाईजैक कर लेते हैं। किसानों को यह समझना होगा कि उनका लक्ष्य कृषि सुधार है, न कि किसी की सरकार बनाना या गिराना।

खुद लड़ें अपनी लड़ाई

दिल्ली की रैली में ही हमने देखा कि विपक्ष की ओर से कृषि संकट पर बात करने के लिए संसद का 21 दिनों का विशेष सत्र बुलाने की मांग की गई। लेकिन नेता इसको लेकर कितना संजीदा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संसद के शीत सत्र में भी किसानों के मुद्दे उठाने का समय किसी भी दल के पास नहीं है। पिछले तीन दिनों में संसद में कोई कामकाज नहीं हो सका है। यह उपेक्षा बताती है कि किसान संगठन अगर खुद अपनी लड़ाई लड़ेंगे तो सही रास्ता निकलने की आशा ज्यादा है।







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