पांच राज्यों के चुनावी नतीजे बताते हैं कि कर्जमाफी का वादा किसानों के लिए ब्रह्मास्त्र बन चुका है, क्योंकि उन्हें पता है कि सत्ता में आने के बाद किसी भी राजनीतिक दल से मोलभाव करना आसान नहीं है। इस सियासी दांव से किसानों की हालत भले ही न सुधरी हो, लेकिन यह उन्हें फौरी राहत जरूर दे रहा है। कांग्रेस के लिए राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में इस वादे ने काफी असर दिखाया है। बेहद कम सीटों से मध्य प्रदेश को गंवाने वाली भाजपा को यह मलाल जरूर हो रहा होगा कि उसने सत्ता में रहते कर्जमाफी लागू कर इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश नहीं की।
इन तीन राज्यों के पहले उत्तर प्रदेश में भाजपा ने किसानों को कर्ज माफी का वादा अच्छे तरीके से भुनाया था और सत्ता में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई थी। पंजाब में यही फायदा कांग्रेस को सत्ता में वापसी करने में मिला और कर्नाटक में लाज बचा ली तो इसके पीछे भी किसानों का कर्ज माफ करना रहा। राजनीतिक पंडितों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अप्रैल 2017 से जुलाई 2018 तक तमिलनाडु, पंजाब, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में किसानों का एक लाख 80 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज माफ किया गया है, जो जीडीपी में करीब 1.5 फीसदी का असर डालता है, लेकिन किसानों के मुद्दे अपनी जगह कायम है।
राजनीतिक पार्टियां भी यह बखूबी जानती हैं। आज देश में कृषि का जीडीपी में योगदान महज 17 फीसदी रह गया है, जबकि इसमें कुल कामगार आबादी का 50 फीसदी लगा हुआ है। मतलब साफ है कि कृषि कार्यों में जरूरत का तीन से चार गुना लोग काम कर रहे हैं। ये बातें हम बचपन से एनसीईआरटी की किताबों में पढ़ते आ रहे हैं। आज सेवा क्षेत्र का जीडीपी में योगदान 53 फीसदी और औद्योगिक क्षेत्र का योगदान 31 फीसदी पहुंच चुका है और इन्हीं क्षेत्रों में रोजगार की सबसे ज्यादा संभावनाएं भी हैं।
राजनीतिक बयानबाजी से अलग सरकारें जानती हैं कि कृषि सुधार देश की बड़ी जरूरत है। कर्ज माफी से किसी राज्य में पांच से दस लाख किसानों को फौरी राहत मिल सकती है, लेकिन उनकी स्थिति नहीं सुधरेगी। वैसे भी कर्जमाफी से उन खेतिहर मजदूरों, बटाईदारों को लाभ नहीं मिलता, जिनकी संख्या देश में सात से नौ करोड़ के बीच है। बड़े किसानों और उनके समर्थक नेता यह भी नहीं चाहते कि मनरेगा के तहत मजदूरी बढ़ाई जाए, क्योंकि इससे उनकी लागत बढ़ने का अंदेशा राहत है।
इन तीन राज्यों के पहले उत्तर प्रदेश में भाजपा ने किसानों को कर्ज माफी का वादा अच्छे तरीके से भुनाया था और सत्ता में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई थी। पंजाब में यही फायदा कांग्रेस को सत्ता में वापसी करने में मिला और कर्नाटक में लाज बचा ली तो इसके पीछे भी किसानों का कर्ज माफ करना रहा। राजनीतिक पंडितों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अप्रैल 2017 से जुलाई 2018 तक तमिलनाडु, पंजाब, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में किसानों का एक लाख 80 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज माफ किया गया है, जो जीडीपी में करीब 1.5 फीसदी का असर डालता है, लेकिन किसानों के मुद्दे अपनी जगह कायम है।
राजनीतिक पार्टियां भी यह बखूबी जानती हैं। आज देश में कृषि का जीडीपी में योगदान महज 17 फीसदी रह गया है, जबकि इसमें कुल कामगार आबादी का 50 फीसदी लगा हुआ है। मतलब साफ है कि कृषि कार्यों में जरूरत का तीन से चार गुना लोग काम कर रहे हैं। ये बातें हम बचपन से एनसीईआरटी की किताबों में पढ़ते आ रहे हैं। आज सेवा क्षेत्र का जीडीपी में योगदान 53 फीसदी और औद्योगिक क्षेत्र का योगदान 31 फीसदी पहुंच चुका है और इन्हीं क्षेत्रों में रोजगार की सबसे ज्यादा संभावनाएं भी हैं।
राजनीतिक बयानबाजी से अलग सरकारें जानती हैं कि कृषि सुधार देश की बड़ी जरूरत है। कर्ज माफी से किसी राज्य में पांच से दस लाख किसानों को फौरी राहत मिल सकती है, लेकिन उनकी स्थिति नहीं सुधरेगी। वैसे भी कर्जमाफी से उन खेतिहर मजदूरों, बटाईदारों को लाभ नहीं मिलता, जिनकी संख्या देश में सात से नौ करोड़ के बीच है। बड़े किसानों और उनके समर्थक नेता यह भी नहीं चाहते कि मनरेगा के तहत मजदूरी बढ़ाई जाए, क्योंकि इससे उनकी लागत बढ़ने का अंदेशा राहत है।
No comments:
Post a Comment